Wednesday, November 21, 2012

शुक्राचार्यका नीतितत्त्वोपदेश

शुक्राचार्य यद्दपि असुरों के गुरु है , किन्तु ये भगवान् के अनन्य भक्त हैं | ये योगविद्द्या के आचार्य है और इनकी शुक्रनीति बहुत प्रसिद्ध् है | असुरों के साथ रहते हुए भी ये उन्हें सदा धर्मकी, नीतिकी, सदाचारकी शिक्षा देते रहे | इन्ही के प्रभाव से प्रह्लाद, बलि तथा विरोचन आदि भगवद्भक्त बने | शुक्रनीति में अनेक सुन्दर बातें आई हैं, उनमें से कुछ यहाँ दी जा रही हैं –
(१)    व्यक्ति को चाहिये कि वह दूरदर्शी बने | सोचविचारकर विवेक से कार्य करे, आलसी किंवा प्रमादी न बने –
      दीर्घदर्शी सदा च स्यात् .......... | चिरकारी भवेन्न हि ||
(२)     बिन सोचे – समझे किसीको मित्र न बनाये |
(३)    विश्वस्तका भी अत्यन्त विश्वाश न करे – नात्यन्तं विश्वसेत् कञ्चित् विश्वस्तमपि सर्वदा ‘|
(४)   अन्नकी निन्दा न करे – ‘अन्न न निन्द्दात् |’
(५)   आयु, धन, गृहके दोष, मन्त्र, मैथुन, औषध, दान, मान तथा अपमान – इन नौ विषयों को अत्यन्त गुप्त रखना चाहिये, किसीसे कहना चाहिये –
        आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रम मंत्रमैथुनभेषजं |
        दानमानापमानं च नवैतानि सुगोपयेत ||
(६)   किसी के साथ कपटपूर्ण व्यवहार तथा किसी की आजीविका की हानि नहीं करनी चाहिये एवं कभी भी किसीका मन से भी अहित नहीं सोचना चाहिये |
(७)   दुर्जनों की संगति का परित्याग करना चाहिये –
त्यजेदुर्जनसंगतं ‘ |
(८)   सुख का उपभोग अकेले न करे , न सभी पर विश्वास ही करे और न सभी पर शंका ही करे –
   नैकः सुखी न सर्वत्र विश्रोब्धो न च शङ्कितः |
सब प्रकार के राजधर्म और नीतिसंदर्भों को बताकर अंत में महामति शुक्राचार्य जी भगवान श्री राम को सर्वोपरि नीतिमान बताते हुए कहते है कि इस पृथ्वी पर भगवान श्री राम के समान कोई दूसरा नीतिमान राजा नहीं हुआ –
   ‘न रामसदृशो राजा पृथिव्यां नीतिमानभूत ‘
इस नीतिवचन द्वारा शुक्राचार्य यही संदेश प्रसारित करते हैं कि राजाओं को श्री रामके समान बनाना चाहिये और प्रजा को श्री राम के आचरणों का अनुकरण करना चाहिये –
    रामादिवद वर्तितव्यं ‘| इसी में सबका परम कल्याण है |


                 भगवान दत्तात्रेयके वचन
अन्तमें हम भगवान श्री दत्तात्रेय के वचन को यहाँ प्रस्तुत करते हैं जिसे उन्होंने अपने शिष्य श्रीकार्तिक स्वामी को परम (मोक्ष ) – कि प्राप्ति के सरल उपाय के रूपमें चार सोपानों में बताया –
       रागद्वेषविनिर्मुक्तः सर्वभूतहिते रतः |
       दृढबोधश्च धीरश्च स गच्छेत् परमं पदम् ||
अर्थात् (१) ‘राग’ (आसक्ति – ममत्व ) एवं ‘द्वेष’ (ईर्ष्याभाव ) – से विमुक्त होना, (२) सभी प्राणियों के हित (कल्याण ) में रत (कार्यरत ) रहना, (३) ब्रह्मज्ञानविषयक बोध दृढ होना तथा (४) धैर्यवान होना – ये परम – पद – प्राप्ति के चार सोपान हैं | वस्तुतः ये ही सम्पूर्ण नीतियों के सार है और भगवत्प्राप्ति के सहज साधन हैं |

देवगुरु बृहस्पति का नीतिविषयक संदेश


         आचार्य बृहस्पति देवताओं के भी गुरु हैं | नीति के आचार्यो में महामति बृहस्पति जी का विशेष स्थान है | बृहस्पति जी के मत में भगवन्नाम का सतत स्मरण ही सर्वोपरि कल्याणकारी नीति है, जो मनुष्य इसका अवलम्बन ले लेता है फिर उसके लिये भगवद्धाम दूर नहीं रहता –
                         सक्रिदुच्चरितम येन हरिरित्यक्षरद्वयम |
                         बुद्धः परिकरसतेन मोक्षाय गमनं प्रति ||
 संसार की अनित्यताको न भूले – आचार्य बृहस्पति कहते हैं कि मनुष्य को दुर्जनों की संगति का परित्याग कर साधुजनोंकी सेवामें संलग्न रहना चाहिये | दिन – रात पुण्य का संचय करते हुए अपनी तथा संसार की अनित्यताका स्मरण रखना चाहिये –
                          त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागम |
                          करु पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यताम||
 धर्म ही सच्चा सहायक है – धर्मराज युधिष्ठिर के यह प्रश्न करनेपर कि संसारमें मनुष्य का सच्चा सहायक कौन है, इस पर बृहस्पतिजी ने जो उपदेश दिया वह नीतिशास्त्र का निचोड़ ही है | बृहस्पतिजी बोले – राजन् ! प्राणी अकेला ही जन्म लेता है, अकेला ही मरता है, अकेला ही दुःखसे पार होता तथा अकेला ही दुर्गति भोगता है, उसके कुटुम्बीजन तो उसके मृत शरीर का परित्याग कर दो घडी रोते हैं, फिर उसकी ओर से मुंह फेरकर चल देते हैं | एकमात्र धर्मही उस जीवत्माका अनुसरण करता है | धर्म ही सच्चा सहायक है, इसलिए मनुष्य को धर्म का ही सदा सेवन करना चाहिये –
            तैस्तच्छरीरमुत्सृष्टं धर्मं एकोअनुगच्छ्ती |
            तस्माद्धर्मः सहायश्च सेवितव्यः सदा नृभिः||
   धर्म नीतिका तत्वरहस्य बताते हुए आचार्य ऋषि कहते हैं – जो बात अपने को अच्छी न लगे वह दूसरों के प्रति भी नहीं करनी चाहिये | यही धर्म का सूक्ष्म लक्षण है | इससे भिन्न जो बर्ताव होता है , वह कमानामूलक है, स्वार्थवश है |

देवराज इन्द्रका नीति – तत्व – रहस्य


वेदोंमें देवताओं के  राजा इन्द्रकी महिमा का विशेष रूप से वर्णन हुआ है | एक बार की बात है जब नीतिधार्मों के उच्छेदक वृत्रासुर का वध करके देवराज इंद्र इन्द्रलोक में लौटे तो उस समय सभी देवताओं और महर्षियों ने उन्हें बहुत सम्मान किया | उसी समय उनके सारथी मातलिने हाथ जोड़कर उनसे पूछा – भगवन् ! जो सबके द्वारा वन्दित होते हैं, उन समस्त देवताओं में आप अग्रगण्य हैं, परन्तु आप भी इस जगत् में जिन महापुरुषों को , नीतिधर्मतत्वज्ञों को प्रणाम करते हैं वे कौन हैं , बतालानेकी कृपा करें |
       इसपर देवराज इन्द्र बोले – मातले ! धर्म, अर्थ और कामका चिंतन करते हुए भी जिनकी बुद्धि धर्म में नहीं लगती, मैं प्रतिदिन उन्हीं को नमस्कार करता हूँ –
                     धर्मं चार्थं च कामं येषां चिन्तयतां मतिः |
                     नाधर्मे वर्तते नित्यं तान् नमस्यामि मातले ||
  हे मातले ! जो अपने को प्राप्त हुए भोगोंमें ही संतुष्ट है, दूसरों से अधिक की इच्छा नहीं रखते हैं, जो सुंदर वाणी बोलते हैं और बोलने में कुशल हैं, जिनमें अहङ्कार तथा कामना का सर्वथा अभाव है तथा जो सबसे पाने योग्य हैं उन्हें मैं नमस्कार करता हूँ –
                      स्वेषु भोगेषु सन्तुष्टाः सुवाचो वचनक्षमाः |
                     अमानकामाच्श्राघ्र्यार्हास्तान नमस्यामि मातले ||
   तीर्थों की महिमा – देवराज इन्द्र ने गङ्गादि तीर्थों में श्रद्धाभक्तिपूर्वक स्नान – अवगाहन करने की प्रेरणा प्रदान की है, इतना ही नहीं वे कहते हैं कि तीर्थों का मन – ही – मन स्मरण करके सामान्य जल में भी उन तीर्थों की भावना करने से उन तीर्थों में जाकर स्नान करने का फल प्राप्त हो जाता है | मनुष्य को चाहिये कि वह कुरुक्षेत्र, गया, गङ्गा, प्रभास और पुष्कर क्षेत्र का मन – ही – मन चिंतन करके जल में स्नान करें, ऐसा करने से वह पाप से उसी प्रकार मुक्त हो जाता है जैसे चंद्रमा राहु के ग्रहण से –
                      कुरुक्षेत्रं गयां गङ्गां प्रभासं पुष्कराणि च
                      एतानि मनसा ध्यात्वा अवगाहेत् ततो जलम |
                      तथा मुच्यन्ति पापेन राहुणा चन्द्रमा यथा ||
सबसे बड़ा तीर्थ गोसेवा -   देवराज इन्द्र बताते हैं कि गौओंमें सभी तीर्थ प्रतिष्ठित हैं, जो मनुष्य गाय की पीठ छूता है और उसकी पूँछको नमस्कार करता है वह मानो तीर्थो में तीन दीनों तक उपवासपूर्वक रहकर स्नान कर लेता है –
                        त्र्यहं स्नातः स भवति निराहारश्च वर्तते |
                        स्पृशते यो गवां पृष्ठं बालधिं च नमस्यति ||
  इस प्रकार संक्षेप में देवराजइन्द्र ने अप्रत्यक्ष – रूप से जो नीति – धर्म का उपदेश दिया वह बड़ा ही कल्याणकारी है |

प्रवर्तक भगवान सदाशिव शंकर


 भगवान् शङ्करका नीतिविषयक ज्ञान
नीतिशास्त्र के प्रवर्तक सदाशिव भगवान् शङ्कर सबके पिता और भगवती पार्वती जगज्जननी जगदम्बा हैं|
अपनी संतान पर उनकी असीम करुणा और कृपा है, उनका नाम ही आशुतोष है | भगवान् शङ्करसे बड़ा नीतिमान और नीतिज्ञ भला और कौन हो सकता है ; क्योंकि वे ही समस्त विधाओं, वेदादिशास्त्रों और आगमों तथा कलाओंके मूल स्रोत हैं | पार्वतीके पूछनेपर भगवान् शंकरने उन्हें नीति – धरमोपदेश प्रदान किया है , जो बड़ा ही उपयोगी और परम हित साधनेवाला है | भवन शंकर बताते हैं कि सबसे बड़ा धर्म है सत्य और सबसे बड़ा पाप है असत्य ----- ‘नास्ति सत्यात् पारो धर्मो नानृतात् पातकं परम् ||’
      कर्मका साक्षी स्वयंको समझे ------ भगवान शंकर बहुत ही मार्मिक बात बतलाते  हुए कहते हैं----- मनुष्यको चाहिये कि वह अपने शुभ अथवा अशुभ कर्ममें स्वयंको ही साक्षी माने और मन, वाणी तथा क्रियाद्वारा कभी भी पाप करनेकी इच्छा न करें; क्योंकि जीव जैसा कर्म करता है , वैसा ही फल पाटा है और अपने कए हुएका स्वयं फल भोगना है , दूसरा कोई उसे भोगनेका अधिकारी नहीं है –
      यादृशं कूरुते कर्म  तादृशं फलमश्नुते ||
      स्वकृतस्य फलं भुंक्ते नान्यस्तदोभ्क्तुमर्हति ||
सदा एक स्थितिमें रहे ---  भगवान शिव बताते हैं कि मनुष्य-योनिमें उत्पन्न मानवके पास गर्भावस्थासे ही नाना प्रकारके दुःख और सुख आते रहते हैं | अतः मनुष्य सुख-दुःख--- इन दोनों स्थितियोंमें सम (स्थिर) – बुद्धि बना रहे विचलित न हो ---
      सुखं प्राप्य न संहृश्येन्न दुखं प्राप्य संज्वरेत् |
        आसक्ति कैसे हटे – जीव का संसार के प्रति जो ममत्व बन जाता है, आसक्ति हो गई है, उसके छूटने का एक सुगम उपाय भगवान् शङ्कर हमें इस प्रकार बताते है – जहाँ जिस व्यक्ति, पारिस्थि, घटना आदि में आसक्ति हो रही है उसमे दोषदृष्टि करनी चाहिये और यह समझना चाहिये कि यह हमारे लिये अत्यन्त अनिष्ट्प्रद है और अभ्युदय में बाधक है | धीरे – धीरे ऐसा करने पर प्रभुकृपा से उस ओर से वैराग्य हो जायेगा तथा भगवान् में मन लग जायेगा –
                    दोषदर्शी भवेत् तत्र यत्र स्नेहः प्रवर्तते |
                    अनिष्टेनान्वितं पश्येद् यथा क्षिप्रं विरज्यते ||
        तृष्ण के समान कोई दुःख नहीं – भगवान् शङ्कर चेतावनी देते हुए कहते हैं कि तृष्णा के समान कोई दुःख नहीं है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है | समस्त कामनाओं का परित्याग करके मनुष्य ब्रह्मा भाव को प्राप्त हो जाता है –
                      नास्ति त्रिष्णासमं दुःखं नास्ति त्यागसमं सुखम्|
                      सर्वान् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ||
      गृहस्थ के लिये कर्तव्यनीतिका निर्धारण – भगवान् शङ्कर ने गृहस्थाश्रम की महिमा बताते हुए एस आश्रम को सर्वोपरि तथा सभीका उपकारक बताया है | परंतु गृही कैसा हो तथा कैसे रहे ? एसके लिये भी भगवान् ने बताया कि जो शील और सदाचार से विनीत है, जिसने अपनी इंद्रियों को वशमें कर रखा है, जो सरलतापूर्ण व्यवहार करता है और समस्त प्राणियों का हितैषी है, जिसको अतिथि प्रिय है, जो क्षमाशील है, जिसने धर्मपूर्वक धन का उपार्जन किया है – ऐसे गृहस्थ के लिये अन्य आश्रमों की क्या आवश्यकता है –
                        शीलवृत्तविनीतस्य निगृहीतेन्द्रियस्य च |
                        आर्जवे वर्तमानस्य सर्वभूतहितैषिणः ||
                        प्रियातिथेश्च क्षान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च |
                        गृहाश्रमपदस्थस्य किमन्यैः क्रित्यमाश्रमैः||
      महान् आश्चर्य -  भगवान् शङ्कर भगवती पार्वती से कहते हैं – देवी ! यह महान् आश्चर्यकी बात है कि मनुष्योंकी इन्द्रियाँ प्रतिक्षण जीर्ण हो रही हैं, आयु नष्ट होती जा रही है और मौत सामने खड़ी है, फिर भी लोगों को दुःखदायी सांसारिक भोगों में सुख भास रहा है, जन्म – मृत्यु और जरासम्बन्धी दुखों से सदा आक्रांत होकर संसार में मनुष्य पकाया जा रहा है जो भी वह पाप से उद्विग्र नहीं हो रहा है –
                     जन्ममृत्युजरादुखैः सततं समभिद्रुतः |
                     संसारे पच्यमानस्तु पापान्नोद्विजते जनः||
      इस प्रकार का नीतिबोध प्रदान कर भगवान् शङ्कर मनुष्यों को सदा सन्मार्ग पर चलने, अपने विहित कर्तव्यकर्मों को करते हुए भगवान् को सतत याद रखने और उन्हें कभी न भूलने का संदेश हमें प्रदान करते हैं |

प्रतिष्ठापक भगवान विष्णु


भगवान् विष्णुद्वारा  नीतिकी शिक्षा
नीतिशास्त्र के प्रतिष्ठापक भगवान् विष्णु लोक – परलोक को शिक्षा देने के लिये अवतरित होते हैं और आचरण द्वारा संसार को रहनी – करनी और रीति – नीति सिखाते हैं | परलोक ज्ञान तथा लोकज्ञान की जीतनी विद्दाएँ एवं शास्त्र हैं उनके मूलरूप नारायण ही हैं | सदाचार और नीति के तो आप मूर्तिमान् स्वरूप ही हैं |
      धर्माचरण ही सदा सहायक होता है – भगवान् विष्णु मनुष्यों को सावधान करते हुए कहते हैं ‘अरे मनुष्यों ! तुम लोग नित्य अपने मरते हुए बन्धु – बंधवोंको देखते हो और उनके लिये कबतक कौन शोक करता है ? यह भी तुम्हारे सामने ही है | मृत व्यक्ति के बन्धु – बांधव थोड़े समय शोक मनाकर कुछ क्रिया – कर्म करके प्रायः उसे भूल जाते हैं | संसार में सबका परस्पर स्वार्थ का ही सम्बन्ध है, कोई किसी का सहायक नहीं है, धर्म को छोड़कर बन्धु – बांधव, नाते – रिश्ते, धन – संपत्ति, पुत्र – पौत्र, आदि कोई भी साथ नहीं देता | अतः सच्चे सहायक धर्म का ही वरण करो, वही इस लोक तथा परलोक में सर्वत्र कल्याण करने वाला है | केवल धर्म ही प्राणी के साथ जाता है | इस सारहीन नश्वर संसार में अपने कल्याण के लिये शीध्र ही धर्म का आश्रय ले लेना चाहिये | धर्म के कार्य को कभी टालना नहीं चाहिये क्योंकि मौत किसी की प्रतीक्षा नहीं करती, वह यह नहीं देखती कि इसने कुछ धर्म कार्य किया है या नहीं | अतः इसे थोडा और समय दे देना चाहिये | ऐसा होता नहीं | काल ( मृत्य ) – के लिये न कोई प्रिय है और न अप्रिय | आयु के क्षीण हो जानेपर वह बलात् प्राण हर लेता है फिर उसे कोई बचा नहीं सकता |
     राजधर्म – राजा के मुख्य धर्म को बताते हुए भगवान् विष्णु कहते हैं – राजाका मुख्य कर्तव्य है प्रजा का पालन करना तथा वर्णाश्रम धर्म की व्यवस्था करना | राजाको सदा यह देखते रहना चाहिये कि लोग अपने – अपने वर्ण तथा आश्रम के अनुसार अपने – अपने धर्म का परिपालन कर रहे या नहीं, नहीं तो इसके लिये यथोचित व्यवस्था करनी चाहिये –
      प्रजापरिपालनं वर्णाश्रमाणां स्वे स्वे धर्मे व्यव्स्थापनम् |
           जो राजा प्रजाके सुख में सुखी और प्रजाके दुःख में दुखी होता है तथा प्रजाका समुचित रूप
से पालन – पोषण, रक्षण – वर्धन करते हुए उन्हें अपनी आत्मा के समान समझता है और परलोक में परम प्रतिष्ठा प्राप्त करता है | प्रजा का दुःख ही राजा के लिये सबसे भारी दुःख है –
     प्रजासुखे सुखी राजा तद्दुःखे यश्च दुखितः |
     स किर्तियुक्तो लोकोअस्मिन् प्रेत्य स्वर्गे महीयते ||
 इसी प्रकार जिस राजाके राज्य में, नगर में कोई चोर नहीं होता, न कोई परस्त्रीगामी होता है, न कोई दुष्ट और परुषवाणी बोलने वाला होता है, न कोई बलात् धन हरण करनेवाला साहसिक ( डाकू ) लुटेरा होता है और न कोई दण्ड और न कोई दण्डविधान का उल्लंघन करने वाला होता है – तात्पर्य है सभी लोग धार्मिक और सद्भर्माचरणका अनुष्ठान करनेवाले होते हैं, वह राजा इंद्रलोक को प्राप्त करता है और यह तभी सम्भव है जब राजा स्वयं परम धार्मिक हो –
      यस्य चौरः पुरे नास्ति नान्यस्त्रीगो न दुष्टवाक् |
      न साहसिकदन्द्घ्नौ स राजा शक्रलोकभाक् ||
एस प्रकार भगवान् विष्णु ने  राजाओंके लिये उत्तम नीति का निर्धारण करके यह प्रतिपादित किया है कि राजा स्वयं धार्मिक, प्रजावत्सल, नीतिमान तथा पराक्रमी हो और वह प्रजा को धर्मकार्यों में ही अनुरक्त रखे |

नीतिशास्त्र के उद्भावक लोकपितामह ब्रह्मा

नीतिशास्त्रके उद्भावक ब्रह्माजीके नीतिवचन


  पितामह  ब्रह्मा भगवल्लीला मुख्य सहचर हैं | भगवद्धर्मको जाननेवाले आचार्योमे ब्रह्माजीक नाम सर्वप्रथम हैं | पितामह ब्रह्माजीने अपने आचरणोंसे जो नीतिका पाठ हमे पढाया वह बहुत ही महत्वका है | ब्रह्माजीने देवर्षि नाराद्को अपने हृदय एवं मनकी स्थितिके विषयमें बताते हुए कहा –

    ‘मेरी वाणी कभी अस्त्य्की ओर प्रवृत नहीं होती | मेरा मन कभी असत्यकी ओर नहीं जाता , मेरी इंद्रियाँ कभी असन्मार्गकी ओर नहीं झुकती ; क्योकि मैं ह्रदय में सदा ही बड़ी उत्कण्ठासे श्रीहरिको धारण किये रहता हूँ | इस प्रकार ब्रह्माजीने अपनी स्थितिके द्वारा यही सर्वोतम संदेश दिया है कि वाणी से असत्य – भाषण न हो, मन कुमार्गपर न जाये , इंद्रियाँ विषयो में प्रवृत न हों , इसका एकमात्र उपाय है कि भगवान को उत्कण्ठापूर्वक हृदय में धारण कर लिया जय | इसी प्रकार एक बड़ी ही सुन्दर और उपयोगी बात बताते हुए ब्रह्माजी कहते हैं कि तभीतक राग –द्वेष आदि चोर पीछे लगे हुए हैं , तभीतक घर कारागारकि तरह बांधे हुए है और तभी तक मोह कि बेड़ियाँ पैरों में पड़ी हैं , जब तक यह जीव भगवान कि शरण में नहीं जाता , भगवान् का नहीं हो जाता –
      तावद् रागादयः स्तेनास्तावत् कारागृहं गृहम् |
      तावन्मोहोअङ्ग्घृनिगदो यावत् कृष्ण न ते जनाः ||

इस प्रकार ब्रह्म्हाजी ने अपनी संतानोंको सदा ही नीतिपरायण रहते हुए भगवन्मार्गपर चलनेकि प्रेरणा प्रदान की है |

सदा के लिये सुखी होने का उपाय --- ब्रम्हाजी अपनी प्रजाको उपदेश देते हुए बताते हैं कि जो अपनी सम्पूर्ण कामनाओंपर विजय प्राप्त कर लेता है , वह सदाके लिये सुखी हो जाता है ; क्योंकि कामनाएं दुःख और बंधनकी हेतु हैं | जैसे कछुआ अपने अंगोंको सब ओरसे समेट लेता है, उसी प्रकार जो विद्वान् मनुष्य अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको सब ओरसे संकुचित करके रजोगुणसे रहित हो जाता है , वह सब प्रकारके बंधनोंसे मुक्त एवं सदाके लिये सुखी हो जाता है |
गृहस्थको क्या करना चाहिये ------ पितामह ब्रह्मा गृहस्थाश्रमको सभी आश्रमोंका उपकारक बताते हुए कहते हैं – गृहस्थको चाहिये कि वह सदा सत्पुरुषोंकी आचारनीतिका पालन करे, अपनी ही स्त्रीसे प्रेम रखे , जितेन्द्रिय रहे , पञ्चमहाज्ञ करे , देवता और अतिथियोंको देनेके बाद जो शेष बचे उसी अन्नको ग्रहण करे | वेदविहित कर्मोको करे , शक्तिके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ करे , दान |
गोहिंसा महान् पाप हैं ----- ब्रह्माजी गायोंकी सेवाको सर्वोपरि महत्त्व देते हुए हमें गोसेवा करनेकी नीति बताते हैं | इसके विपरीत जो गायोंकी हत्या करते हैं उनका मांस खाते हैं अथवा जो स्वार्थवश गायको मरनेकी सलाह देते हैं, वे सभी महान् पापके भाभी होते हैं | गायोंकी हत्या करनेवाले लोग गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं उतने वर्षोंतक नरकमें डूबे रहते हैं |
      ब्रह्माजी देवराज इन्द्रसे कहते हैं कि जो गोसेवाका व्रत लेनेवाला पुरुष गौओंपर दया करता है और प्रतिदिन एक समय भोजन करके दूसरे समयका अपना भोजन गौओंको देता है --- इस प्रकार दस वर्षतक गोसेवामें तत्पर रहनेवाला वह पुरुष अनन्त सुख प्राप्त करता है –
      यदेकभक्तमश्नियाद् दाद्धादेकं गवां च यत् |
      दशवर्षान्यनन्तानि गोव्रती गोअनुकम्पकः ||
 निष्काम कर्मानुष्ठान ब्रह्माभावकी प्राप्ति  - पितामह ब्रह्मा जी अपनी प्रजा को बताते हैं कि निष्कामभाव से कर्म करते हुए उन्हें भगवान् को अर्पण कर देना चाहिये क्योंकि ‘मम ‘ – यह मेरा नहीं है- ऐसा भाव रखने से कर्तापन का अभिमान भी नहीं रहता और आसक्ति भी दूर हो जाती है | इससे उसे सनातन ब्रम्हा की प्राप्ति हो जाती है –
        
      द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्मा शाश्र्वतं |
      ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेत च शाश्र्वतं ||

Saturday, November 3, 2012

भूमण्डलका अमृत


महर्षि वेदव्यास नीतिशास्त्रको इस भूमण्डलका अमृत , उत्तम नेत्र तथा श्रेयप्राप्तिका सर्वोच्च उपाय मानते है | समाज को स्वस्थ एवं संतुलित पथ पर अग्रसर करने एवं व्यक्ति को धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष की उचित रीतिसे प्राप्ति करानेके लिये जिन विधि या निषेधमूलक वैयक्तिक और सामाजिक नियमोंका विधान देश-काल और पात्रके सन्दर्भमें किया जाता है उसे निति कहते है | दूसरे शब्दों में व्यवहारकी वह रीति , जिससे अपना हित हो एवं दूसरोंको कष्ट या हानि न पहुँचे निति कहलाती है | ये वे नियम हैं जिन पर चलने से मनुष्यका ऐहिक , आमुष्मिक तथा सर्वविध कल्याण होता है . समाजमें संतुलन और स्थिरता बनी रहती है तथा सभी प्रकार से अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त होता है | भव यह है कि उचित व्यवहार का नाम निति है , इसीसे कर्तव्याकर्तव्यका बोध होता है, धर्ममें रति तथा अधर्म में विरति इसी बोध कि देन है  |
धर्म मानवमात्रका एक ऐसा उचित कर्तव्य है जिसका पालन करनेसे व्यक्ति, समाज, राष्ट्र तथा सम्पूर्ण लोकोंकि स्थिति , सत्ता अक्षुण्ण बनी रहती है तथा जिससे मानव इस लोक में अभ्युदय तथा परकोल में परमात्मा कि प्राप्तिरूप निःश्रेयसको प्राप्त करते हैं |  यतोअभ्युदयनिः श्रेयससिद्धिः सधर्मः‘
यहाँ अभ्युदय का तात्पर्य है लौकिक जीवन में उन्नति करना | निःश्रेयसका अर्थ इस प्रकार समझना चाहिये – श्रेयस का अर्थ है कल्याण , जिस कल्याण से बढकर दूसरा कोई बड़ा या अधिक महत्वका कल्याण न हो उस सर्वश्रेष्ट या सर्वोपरि कल्याणको निःश्रेयस कहते है | सर्वश्रेष्ट कल्याण है – ‘मोक्ष ‘ , अर्थात् जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्ति | यदि प्राणी मानव जन्म लेकर भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सका तो उसने जीवन व्यर्थ ही गँवाया | वह ‘पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्‘ के चक्कर मे पड़ा रहेगा | भारत कि यही विशेषता है कि यहाँ धर्मको प्रधानता दी गयी है , कारण कि धर्म का सीधा सम्बन्ध मोक्षसे है | धर्म से अविरुद्ध कम और अर्थका सेवन करता हुआ मानव यहाँ मोक्ष प्राप्त कर लेता है | इसलिए सर्वतोभावेन सबको धर्मका पालन करना चाहिये |

धर्मशास्त्रने निति-नियमोंको विशेष महत्व प्रदान किया है | अतः वेद्, उपनिषद्, रामायण , महाभारत , स्मृति एवं पुराणादिमें निति-कथन विशेषरूप से हुआ है |
                प्राचीन शास्त्रों के मतानुसार धर्म एवं निति का अद्वैत (एक्य) है | धर्म और निति के परिपालन के बिना कोई भी पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता – ऐसा उनका सिद्धांत है | महर्षि व्यास और महर्षि वाल्मीकि – जैसे महाकवि , श्रीराम और श्रीकृष्ण – जैसे भगवदीय अवतारी पुरुषपुंगव तथा सीता, सावित्री, अनुसूया – जैसी महान् पतिव्रता नारियाँ एवं जनक , रघु , पृथु , पूरु, बलि जैसे राजर्षि; ध्रुव – प्रह्लाद – जैसे भगवद्भक्त; कपिल , पतञ्जलि, कणाद, गौतम- जैसे तत्ववेत्ता; बुद्ध, महावीर आदिशंकराचार्य  जैसे भगवदीय धर्मगुरु- इनके उदात्त चरित प्राचीन भारत के निति – आदर्श मने गए हैं |
चूंकि मनुष्यका अन्तिम प्राप्तव्य (लक्ष) मोक्ष बताया गया है | जन्म-मृत्यु-चक्रसे विमुक्त होना ही मोक्ष है | यह भी कहते हैं कि कर्म से मनुष्य बद्ध होता है और परमेश्वरकि कृपासे किंवा परमार्थज्ञानसे मनुष्य मुक्त होता है | ज्ञान तथा कृपा केवल बौद्धिक ज्ञानसे किंवा तर्क से प्राप्त नहीं होते है | उनके लिये तो मनुष्यको विवेक , वैराग्य , तप, मनोग्रह, वासनाक्षय इत्यादिकी आवश्यकता होती है | यही नितिकि नींव है | मनुष्य धर्म-निति का आश्रय ग्रहण करके सुसंस्कृत हुआ है | यह वेदादि ग्रंथोके अनुशीलनसे प्रतीत होता है –-
अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रो भवतु संमनाः |
जाया पत्ये मधुमतीं वाचं बदतु शन्तिवाम् ||
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा |
सम्यंच सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया ||
      अर्थात पुत्रको पितृव्रतका और माताकी आज्ञाका पालन करना चाहिये, पत्रीको पतिसे मृदु एवं मधुरवाणीमें बोलना चाहिये | भाईको भाईसे तथा बहन को बहन से विद्वेष नहीं करना चाहिये , परस्परप्रेम रखकर और समान-ब्रत धारण करके भद्र (कल्याणकारी) वाणीसे बोलना चाहिये |
सहकारी संगठन एवं समता इत्यादिका नितिपूर्ण उपदेश वेदद्वारा इस प्रकार दिया गया है –
सं गच्छध्वं सं बद्ध्वं सं वो मनांसि जानताम्’
अर्थात् तुम मिलकर चलो, एक साथ होकर स्तोत्र-गण करो , तुम्हारे मनोभाव एकरूप हों |
‘समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः ‘
अर्थात तुम्हारा अध्यवसाय (निश्चय) एक हो , तुम्हारा हृदय भी एक हो | कठोपनिषद यह संदेश देता है –
सह नाववतु | सह नौ भुनक्तु | सह वीर्य करवावहै ‘|
अर्थात् परमात्मा हम दोनों का रक्षण करें , हम दोनों का पालन करें , हम दोनों का एक ही समय  सामर्थ्य – सम्पादन करायें |
   ऐसे अनेक नीति – वचन वेद्वाङ्ग्म्य में प्रदर्शित हैं |
.नीति – पालन का तात्पर्य यह है कि परिवार, स्वसमाज और स्वराष्ट्र के उस पार दृष्टिक्षेप करके हम अखिल मानव - जाति तथा प्राणिमात्र से प्रेम का व्यवहार करें, विश्वबन्धुत्व उदात्तभाव रखें तथा सभी के साथ मैत्री करें |
      ऐसा अत्यन्त विशाल और उदार मनोभाव प्राचीन ऋषियों ने अभिव्यक्त किया है | प्राणिमात्र के प्रति मैं मित्रभाव से ही देखूँ और मेरे मन में सभी अपवित्र विचार – श्रृंखलाएँ नष्ट हो जाएँ , मेरे मन में किसी के भी विषय में शत्रुभाव न हो, कोई बड़ा हो अथवा छोटा हो – मेरा स्नेहभाव उनपर सदा हो, ऐसी प्रशस्त नीति की प्रार्थना वेद में की गई है |
       नीतिकारों नें सत्यवचन तथा मृदुभाशन पर अत्यधिक बल दिया है | सत्य जीवन का वह अकाट्य धर्म है, जिसने मनुष्य को सामाजिक तथा व्यावहारिक जीवनमें प्रतिष्ठा प्रदान की है | साथ ही परलोक का मार्ग भी प्रशस्त किया है | मुण्डकोपनिषदका उद्धोष्  है –‘ सत्यमेव जयति नानृतम’
विजय सत्य की होती है असत्य कि नहीं |
           आचार्य चाणक्य तो यहाँ तक कहते हैं –
           सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः |
        सतवेन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम ||
          अर्थात पृथ्वी में धारण कराने की क्षमता सत्ये से ही आती है,  सत्य के कारण ही सूर्य तपता है , सत्य के बल पर ही वायु का संचरण होता है तथा सर्वस्व की प्रतिष्ठा सत्य में ही है |
          गोस्वामी तुलसीदासजी कहते हैं ‘ धरमु न दूसर सत्य समाना | आगम निगम पुरान बखाना ||’ अन्यत्र उनकी अभिव्यक्ति है ‘सत्यमूल सब सुकृत सुहाए | बेद पुरान बिदित मनु गाए ||’
          कबीरदास की मान्यता है की सत्य के बराबर कोई तप नहीं | झूठ के बराबर कोई पाप नहीं | ‘साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप |’ तथा जिसके ह्रदय में सत्य का वास है वहाँ भगवान का निवास है – ‘जाके हिरदै साँच है , ताके हिरदै आप ‘|
          कवियों के नीति – वचनों में वाणी की मधुरता पर भी पर्याप्त बल दिया गया है | कबीरदासजी का आग्रह है कि ‘ऐसी बानी बोलिये, मन का आप खोय | औरन कौं सीतल करे, आपहु सीतल होय ||’ उनकी दृष्टि में ‘मधुर वचन है औषधि कटुक वचन है तीर’
यह तीर ( कटु वचन ) प्रवेश तो श्रवणद्वार से करता है किन्तु सालता है सम्पूर्ण शरीर को –
श्रवण द्वार ह्वै संचरै सालै सकल सरीर’|
       हिंदी के नीतिकारों ने आत्मिक उन्नति पर भी पर्याप्त बल दिया है | इस क्रम में उन्होंने उन दोषों कि चर्चा भी कि है जो आत्मिक उन्नति में बाधक है – काम , क्रोध , लोभ , मोह , मद आदि ऐसे ही दुर्गुड हैं | कबीरदासजी कि उक्ति है – ‘कम क्रोध मद लोभ की, जब लगी घट मैं खान | कहा मुरख कहा पंडिता, दोनों एक समान ||’
कबीरदासजी कहते हैं कि जबतक मन का मैल साफ़ नहीं होगा तबतक नहाना – धोना व्यर्थ है | मछली सदैव पानी में रहती है फिर भी उसकी दुर्गन्ध नहीं जाती – ‘न्हाये धोये का भया जो मन मैल न जाय | मीन सदा जल में रहे धोये बास न जाय ||’
       नीतिके सिद्धान्तों के अनुपालन से मन की निर्मलता सहज ही प्राप्त हो जाती है | मन निर्मल हो जाय, अन्तःकरण पवित्र हो जाय तो फिर आत्मकल्याण स्वयं ही सध जाएगा |
        आत्मकल्याण का संदेश प्रदान करने वाले उपनिषदों को तो नीति – सूक्तों का भण्डार ही माना गया है | तैत्तिरीय उपनिषद में विद्द्या पूर्ण करके स्वगृह जानेवाले स्त्रात को गुरु उपदेश करते हैं – ‘सत्यं वद, धर्मं चर, स्वाध्यायान्मा प्रमदः ’ – अर्थात् सत्य बोलो धर्म का आचरण करो,  स्वाध्याय में प्रमाद मत करो | ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव , आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव’ – माता में देवबुद्धि रखनेवाले बनो, पितामें देवबुद्धि रखनेवाले बनो, आचार्यमें देवबुद्धि रखनेवाले बनो तथा अतिथिमें देवबुद्धि रखनेवाले बनो | इसी प्रकार अन्य उपदेशों में कहा गया है – ‘सम्पत्तिका गर्व मत करो’ , ‘अनिन्द्द एवं पुन्यकारक कर्म ही करो’ , ‘सदाचार का अनुपालन करो |’
         इन श्रुतिवचनो में नीतितत्व का सार समाहित है |
         कठोपनिषद में एक विशिष्ट नीतिवचन द्वारा बताया गया है कि इन्द्रियसुख का प्रेयमार्ग छोड़कर शाश्वत सुख – शांतिका नैतिक श्रेयमार्ग मनुष्य को ग्रहण करना चाहिये | यह श्रेयमार्ग ही भगवत्प्राप्तिका राजपथ है , जिसपर चलने से सर्वविध कल्याण निश्चित है | अतः प्रत्येक मानव को इसे स्वीकार करना चाहिये |