Wednesday, November 21, 2012

नीतिशास्त्र के उद्भावक लोकपितामह ब्रह्मा

नीतिशास्त्रके उद्भावक ब्रह्माजीके नीतिवचन


  पितामह  ब्रह्मा भगवल्लीला मुख्य सहचर हैं | भगवद्धर्मको जाननेवाले आचार्योमे ब्रह्माजीक नाम सर्वप्रथम हैं | पितामह ब्रह्माजीने अपने आचरणोंसे जो नीतिका पाठ हमे पढाया वह बहुत ही महत्वका है | ब्रह्माजीने देवर्षि नाराद्को अपने हृदय एवं मनकी स्थितिके विषयमें बताते हुए कहा –

    ‘मेरी वाणी कभी अस्त्य्की ओर प्रवृत नहीं होती | मेरा मन कभी असत्यकी ओर नहीं जाता , मेरी इंद्रियाँ कभी असन्मार्गकी ओर नहीं झुकती ; क्योकि मैं ह्रदय में सदा ही बड़ी उत्कण्ठासे श्रीहरिको धारण किये रहता हूँ | इस प्रकार ब्रह्माजीने अपनी स्थितिके द्वारा यही सर्वोतम संदेश दिया है कि वाणी से असत्य – भाषण न हो, मन कुमार्गपर न जाये , इंद्रियाँ विषयो में प्रवृत न हों , इसका एकमात्र उपाय है कि भगवान को उत्कण्ठापूर्वक हृदय में धारण कर लिया जय | इसी प्रकार एक बड़ी ही सुन्दर और उपयोगी बात बताते हुए ब्रह्माजी कहते हैं कि तभीतक राग –द्वेष आदि चोर पीछे लगे हुए हैं , तभीतक घर कारागारकि तरह बांधे हुए है और तभी तक मोह कि बेड़ियाँ पैरों में पड़ी हैं , जब तक यह जीव भगवान कि शरण में नहीं जाता , भगवान् का नहीं हो जाता –
      तावद् रागादयः स्तेनास्तावत् कारागृहं गृहम् |
      तावन्मोहोअङ्ग्घृनिगदो यावत् कृष्ण न ते जनाः ||

इस प्रकार ब्रह्म्हाजी ने अपनी संतानोंको सदा ही नीतिपरायण रहते हुए भगवन्मार्गपर चलनेकि प्रेरणा प्रदान की है |

सदा के लिये सुखी होने का उपाय --- ब्रम्हाजी अपनी प्रजाको उपदेश देते हुए बताते हैं कि जो अपनी सम्पूर्ण कामनाओंपर विजय प्राप्त कर लेता है , वह सदाके लिये सुखी हो जाता है ; क्योंकि कामनाएं दुःख और बंधनकी हेतु हैं | जैसे कछुआ अपने अंगोंको सब ओरसे समेट लेता है, उसी प्रकार जो विद्वान् मनुष्य अपनी सम्पूर्ण कामनाओंको सब ओरसे संकुचित करके रजोगुणसे रहित हो जाता है , वह सब प्रकारके बंधनोंसे मुक्त एवं सदाके लिये सुखी हो जाता है |
गृहस्थको क्या करना चाहिये ------ पितामह ब्रह्मा गृहस्थाश्रमको सभी आश्रमोंका उपकारक बताते हुए कहते हैं – गृहस्थको चाहिये कि वह सदा सत्पुरुषोंकी आचारनीतिका पालन करे, अपनी ही स्त्रीसे प्रेम रखे , जितेन्द्रिय रहे , पञ्चमहाज्ञ करे , देवता और अतिथियोंको देनेके बाद जो शेष बचे उसी अन्नको ग्रहण करे | वेदविहित कर्मोको करे , शक्तिके अनुसार प्रसन्नतापूर्वक यज्ञ करे , दान |
गोहिंसा महान् पाप हैं ----- ब्रह्माजी गायोंकी सेवाको सर्वोपरि महत्त्व देते हुए हमें गोसेवा करनेकी नीति बताते हैं | इसके विपरीत जो गायोंकी हत्या करते हैं उनका मांस खाते हैं अथवा जो स्वार्थवश गायको मरनेकी सलाह देते हैं, वे सभी महान् पापके भाभी होते हैं | गायोंकी हत्या करनेवाले लोग गौके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं उतने वर्षोंतक नरकमें डूबे रहते हैं |
      ब्रह्माजी देवराज इन्द्रसे कहते हैं कि जो गोसेवाका व्रत लेनेवाला पुरुष गौओंपर दया करता है और प्रतिदिन एक समय भोजन करके दूसरे समयका अपना भोजन गौओंको देता है --- इस प्रकार दस वर्षतक गोसेवामें तत्पर रहनेवाला वह पुरुष अनन्त सुख प्राप्त करता है –
      यदेकभक्तमश्नियाद् दाद्धादेकं गवां च यत् |
      दशवर्षान्यनन्तानि गोव्रती गोअनुकम्पकः ||
 निष्काम कर्मानुष्ठान ब्रह्माभावकी प्राप्ति  - पितामह ब्रह्मा जी अपनी प्रजा को बताते हैं कि निष्कामभाव से कर्म करते हुए उन्हें भगवान् को अर्पण कर देना चाहिये क्योंकि ‘मम ‘ – यह मेरा नहीं है- ऐसा भाव रखने से कर्तापन का अभिमान भी नहीं रहता और आसक्ति भी दूर हो जाती है | इससे उसे सनातन ब्रम्हा की प्राप्ति हो जाती है –
        
      द्व्यक्षरस्तु भवेन्मृत्युस्त्र्यक्षरं ब्रह्मा शाश्र्वतं |
      ममेति च भवेन्मृत्युर्न ममेत च शाश्र्वतं ||

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