Wednesday, November 21, 2012

प्रतिष्ठापक भगवान विष्णु


भगवान् विष्णुद्वारा  नीतिकी शिक्षा
नीतिशास्त्र के प्रतिष्ठापक भगवान् विष्णु लोक – परलोक को शिक्षा देने के लिये अवतरित होते हैं और आचरण द्वारा संसार को रहनी – करनी और रीति – नीति सिखाते हैं | परलोक ज्ञान तथा लोकज्ञान की जीतनी विद्दाएँ एवं शास्त्र हैं उनके मूलरूप नारायण ही हैं | सदाचार और नीति के तो आप मूर्तिमान् स्वरूप ही हैं |
      धर्माचरण ही सदा सहायक होता है – भगवान् विष्णु मनुष्यों को सावधान करते हुए कहते हैं ‘अरे मनुष्यों ! तुम लोग नित्य अपने मरते हुए बन्धु – बंधवोंको देखते हो और उनके लिये कबतक कौन शोक करता है ? यह भी तुम्हारे सामने ही है | मृत व्यक्ति के बन्धु – बांधव थोड़े समय शोक मनाकर कुछ क्रिया – कर्म करके प्रायः उसे भूल जाते हैं | संसार में सबका परस्पर स्वार्थ का ही सम्बन्ध है, कोई किसी का सहायक नहीं है, धर्म को छोड़कर बन्धु – बांधव, नाते – रिश्ते, धन – संपत्ति, पुत्र – पौत्र, आदि कोई भी साथ नहीं देता | अतः सच्चे सहायक धर्म का ही वरण करो, वही इस लोक तथा परलोक में सर्वत्र कल्याण करने वाला है | केवल धर्म ही प्राणी के साथ जाता है | इस सारहीन नश्वर संसार में अपने कल्याण के लिये शीध्र ही धर्म का आश्रय ले लेना चाहिये | धर्म के कार्य को कभी टालना नहीं चाहिये क्योंकि मौत किसी की प्रतीक्षा नहीं करती, वह यह नहीं देखती कि इसने कुछ धर्म कार्य किया है या नहीं | अतः इसे थोडा और समय दे देना चाहिये | ऐसा होता नहीं | काल ( मृत्य ) – के लिये न कोई प्रिय है और न अप्रिय | आयु के क्षीण हो जानेपर वह बलात् प्राण हर लेता है फिर उसे कोई बचा नहीं सकता |
     राजधर्म – राजा के मुख्य धर्म को बताते हुए भगवान् विष्णु कहते हैं – राजाका मुख्य कर्तव्य है प्रजा का पालन करना तथा वर्णाश्रम धर्म की व्यवस्था करना | राजाको सदा यह देखते रहना चाहिये कि लोग अपने – अपने वर्ण तथा आश्रम के अनुसार अपने – अपने धर्म का परिपालन कर रहे या नहीं, नहीं तो इसके लिये यथोचित व्यवस्था करनी चाहिये –
      प्रजापरिपालनं वर्णाश्रमाणां स्वे स्वे धर्मे व्यव्स्थापनम् |
           जो राजा प्रजाके सुख में सुखी और प्रजाके दुःख में दुखी होता है तथा प्रजाका समुचित रूप
से पालन – पोषण, रक्षण – वर्धन करते हुए उन्हें अपनी आत्मा के समान समझता है और परलोक में परम प्रतिष्ठा प्राप्त करता है | प्रजा का दुःख ही राजा के लिये सबसे भारी दुःख है –
     प्रजासुखे सुखी राजा तद्दुःखे यश्च दुखितः |
     स किर्तियुक्तो लोकोअस्मिन् प्रेत्य स्वर्गे महीयते ||
 इसी प्रकार जिस राजाके राज्य में, नगर में कोई चोर नहीं होता, न कोई परस्त्रीगामी होता है, न कोई दुष्ट और परुषवाणी बोलने वाला होता है, न कोई बलात् धन हरण करनेवाला साहसिक ( डाकू ) लुटेरा होता है और न कोई दण्ड और न कोई दण्डविधान का उल्लंघन करने वाला होता है – तात्पर्य है सभी लोग धार्मिक और सद्भर्माचरणका अनुष्ठान करनेवाले होते हैं, वह राजा इंद्रलोक को प्राप्त करता है और यह तभी सम्भव है जब राजा स्वयं परम धार्मिक हो –
      यस्य चौरः पुरे नास्ति नान्यस्त्रीगो न दुष्टवाक् |
      न साहसिकदन्द्घ्नौ स राजा शक्रलोकभाक् ||
एस प्रकार भगवान् विष्णु ने  राजाओंके लिये उत्तम नीति का निर्धारण करके यह प्रतिपादित किया है कि राजा स्वयं धार्मिक, प्रजावत्सल, नीतिमान तथा पराक्रमी हो और वह प्रजा को धर्मकार्यों में ही अनुरक्त रखे |

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