आचार्य बृहस्पति देवताओं के
भी गुरु हैं | नीति के आचार्यो में महामति बृहस्पति जी का विशेष स्थान है |
बृहस्पति जी के मत में भगवन्नाम का सतत स्मरण ही सर्वोपरि कल्याणकारी नीति है, जो
मनुष्य इसका अवलम्बन ले लेता है फिर उसके लिये भगवद्धाम दूर नहीं रहता –
सक्रिदुच्चरितम येन
हरिरित्यक्षरद्वयम |
बुद्धः
परिकरसतेन मोक्षाय गमनं प्रति ||
संसार की अनित्यताको न भूले – आचार्य बृहस्पति कहते हैं कि
मनुष्य को दुर्जनों की संगति का परित्याग कर साधुजनोंकी सेवामें संलग्न रहना
चाहिये | दिन – रात पुण्य का संचय करते हुए अपनी तथा संसार की अनित्यताका स्मरण
रखना चाहिये –
त्यज दुर्जनसंसर्गं भज साधुसमागम
|
करु
पुण्यमहोरात्रं स्मर नित्यमनित्यताम||
धर्म ही सच्चा सहायक है – धर्मराज युधिष्ठिर के यह प्रश्न करनेपर कि संसारमें
मनुष्य का सच्चा सहायक कौन है, इस पर बृहस्पतिजी ने जो उपदेश दिया वह नीतिशास्त्र
का निचोड़ ही है | बृहस्पतिजी बोले – राजन् ! प्राणी अकेला ही जन्म लेता है, अकेला ही मरता है,
अकेला ही दुःखसे पार होता तथा
अकेला ही दुर्गति भोगता है, उसके कुटुम्बीजन तो उसके मृत शरीर का परित्याग कर दो
घडी रोते हैं, फिर उसकी ओर से मुंह फेरकर चल देते हैं | एकमात्र धर्मही उस
जीवत्माका अनुसरण करता है | धर्म ही सच्चा सहायक है, इसलिए मनुष्य को धर्म का ही
सदा सेवन करना चाहिये –
तैस्तच्छरीरमुत्सृष्टं धर्मं एकोअनुगच्छ्ती |
तस्माद्धर्मः सहायश्च
सेवितव्यः सदा नृभिः||
धर्म नीतिका तत्वरहस्य बताते हुए आचार्य ऋषि कहते
हैं – जो बात अपने को अच्छी न लगे वह दूसरों के प्रति भी नहीं करनी चाहिये | यही
धर्म का सूक्ष्म लक्षण है | इससे भिन्न जो बर्ताव होता है , वह कमानामूलक है,
स्वार्थवश है |
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