भगवान् शङ्करका नीतिविषयक ज्ञान
नीतिशास्त्र के प्रवर्तक सदाशिव भगवान् शङ्कर सबके पिता और भगवती पार्वती जगज्जननी जगदम्बा हैं|
अपनी संतान पर उनकी असीम करुणा और कृपा है, उनका नाम ही आशुतोष है | भगवान् शङ्करसे बड़ा नीतिमान और नीतिज्ञ भला और कौन हो सकता है ; क्योंकि वे ही समस्त
विधाओं, वेदादिशास्त्रों और आगमों तथा कलाओंके मूल स्रोत हैं | पार्वतीके पूछनेपर
भगवान् शंकरने उन्हें नीति –
धरमोपदेश प्रदान किया है , जो बड़ा ही उपयोगी और परम हित साधनेवाला है | भवन शंकर
बताते हैं कि सबसे बड़ा धर्म है सत्य और सबसे बड़ा पाप है असत्य ----- ‘नास्ति
सत्यात् पारो धर्मो नानृतात् पातकं परम् ||’
कर्मका साक्षी स्वयंको समझे ------ भगवान शंकर बहुत ही मार्मिक
बात बतलाते हुए कहते हैं----- मनुष्यको
चाहिये कि वह अपने शुभ अथवा अशुभ कर्ममें स्वयंको ही साक्षी माने और मन, वाणी तथा
क्रियाद्वारा कभी भी पाप करनेकी इच्छा न
करें; क्योंकि जीव जैसा कर्म करता है , वैसा ही फल पाटा है और अपने कए हुएका स्वयं
फल भोगना है , दूसरा कोई उसे भोगनेका अधिकारी नहीं है –
यादृशं कूरुते कर्म तादृशं फलमश्नुते ||
स्वकृतस्य फलं भुंक्ते
नान्यस्तदोभ्क्तुमर्हति ||
सदा एक स्थितिमें रहे --- भगवान शिव बताते हैं कि
मनुष्य-योनिमें उत्पन्न मानवके पास गर्भावस्थासे ही नाना प्रकारके दुःख और सुख आते
रहते हैं | अतः मनुष्य सुख-दुःख--- इन दोनों स्थितियोंमें सम (स्थिर) – बुद्धि बना
रहे विचलित न हो ---
सुखं प्राप्य न संहृश्येन्न दुखं प्राप्य संज्वरेत् |
आसक्ति कैसे हटे – जीव का संसार के प्रति जो ममत्व बन जाता है, आसक्ति
हो गई है, उसके छूटने का एक सुगम उपाय भगवान् शङ्कर हमें इस प्रकार बताते है – जहाँ जिस व्यक्ति, पारिस्थि,
घटना आदि में आसक्ति हो रही है उसमे दोषदृष्टि करनी चाहिये और यह समझना चाहिये कि
यह हमारे लिये अत्यन्त अनिष्ट्प्रद है और अभ्युदय में बाधक है | धीरे – धीरे ऐसा करने
पर प्रभुकृपा से उस ओर से वैराग्य हो जायेगा तथा भगवान् में मन लग जायेगा –
दोषदर्शी भवेत् तत्र यत्र
स्नेहः प्रवर्तते |
अनिष्टेनान्वितं
पश्येद् यथा क्षिप्रं विरज्यते ||
तृष्ण के समान कोई दुःख नहीं – भगवान् शङ्कर चेतावनी देते हुए कहते हैं कि तृष्णा के समान कोई दुःख नहीं
है और त्याग के समान कोई सुख नहीं है | समस्त कामनाओं का परित्याग करके मनुष्य
ब्रह्मा भाव को प्राप्त हो जाता है –
नास्ति त्रिष्णासमं दुःखं
नास्ति त्यागसमं सुखम्|
सर्वान् कामान् परित्यज्य ब्रह्मभूयाय कल्पते ||
गृहस्थ के लिये कर्तव्यनीतिका निर्धारण – भगवान् शङ्कर ने गृहस्थाश्रम की महिमा बताते हुए एस
आश्रम को सर्वोपरि तथा सभीका उपकारक बताया है | परंतु गृही कैसा हो तथा कैसे रहे ?
एसके लिये भी भगवान् ने बताया कि जो शील और सदाचार से विनीत है, जिसने अपनी इंद्रियों को वशमें कर रखा
है, जो सरलतापूर्ण व्यवहार करता है और समस्त प्राणियों का हितैषी है, जिसको अतिथि
प्रिय है, जो क्षमाशील है, जिसने धर्मपूर्वक धन का उपार्जन किया है – ऐसे गृहस्थ
के लिये अन्य आश्रमों की क्या आवश्यकता है –
शीलवृत्तविनीतस्य
निगृहीतेन्द्रियस्य च |
आर्जवे
वर्तमानस्य सर्वभूतहितैषिणः ||
प्रियातिथेश्च
क्षान्तस्य धर्मार्जितधनस्य च |
गृहाश्रमपदस्थस्य किमन्यैः क्रित्यमाश्रमैः||
महान् आश्चर्य - भगवान् शङ्कर भगवती पार्वती से कहते हैं – देवी ! यह महान्
आश्चर्यकी बात है कि मनुष्योंकी इन्द्रियाँ प्रतिक्षण जीर्ण हो रही हैं, आयु नष्ट होती जा रही है
और मौत सामने खड़ी है, फिर भी लोगों को दुःखदायी सांसारिक भोगों में सुख भास रहा
है, जन्म – मृत्यु और जरासम्बन्धी दुखों से सदा आक्रांत होकर संसार में मनुष्य
पकाया जा रहा है जो भी वह पाप से उद्विग्र नहीं हो रहा है –
जन्ममृत्युजरादुखैः सततं समभिद्रुतः |
संसारे
पच्यमानस्तु पापान्नोद्विजते जनः||
इस प्रकार का नीतिबोध प्रदान कर भगवान् शङ्कर मनुष्यों को सदा सन्मार्ग पर
चलने, अपने विहित कर्तव्यकर्मों को करते हुए भगवान् को सतत याद रखने और उन्हें कभी न भूलने का संदेश हमें
प्रदान करते हैं |

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