महर्षि वेदव्यास नीतिशास्त्रको इस भूमण्डलका अमृत , उत्तम नेत्र तथा
श्रेयप्राप्तिका सर्वोच्च उपाय मानते है | समाज को स्वस्थ एवं संतुलित पथ पर
अग्रसर करने एवं व्यक्ति को धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष की उचित रीतिसे प्राप्ति
करानेके लिये जिन विधि या निषेधमूलक वैयक्तिक और सामाजिक नियमोंका विधान देश-काल
और पात्रके सन्दर्भमें किया जाता है उसे निति कहते है | दूसरे शब्दों में
व्यवहारकी वह रीति , जिससे अपना हित हो एवं दूसरोंको कष्ट या हानि न पहुँचे निति
कहलाती है | ये वे नियम हैं जिन पर चलने से मनुष्यका ऐहिक , आमुष्मिक तथा सर्वविध कल्याण होता है . समाजमें संतुलन और स्थिरता
बनी रहती है तथा सभी प्रकार से अभ्युदय का मार्ग प्रशस्त होता है | भव यह है कि
उचित व्यवहार का नाम निति है , इसीसे कर्तव्याकर्तव्यका बोध होता है, धर्ममें रति
तथा अधर्म में विरति इसी बोध कि देन है |
धर्म मानवमात्रका एक ऐसा उचित कर्तव्य है जिसका पालन करनेसे व्यक्ति, समाज,
राष्ट्र तथा सम्पूर्ण लोकोंकि स्थिति , सत्ता अक्षुण्ण बनी रहती है तथा जिससे मानव
इस लोक में अभ्युदय तथा परकोल में परमात्मा कि प्राप्तिरूप निःश्रेयसको प्राप्त
करते हैं | ‘यतोअभ्युदयनिः श्रेयससिद्धिः सधर्मः‘
यहाँ अभ्युदय का तात्पर्य है लौकिक जीवन में उन्नति करना | निःश्रेयसका अर्थ
इस प्रकार समझना चाहिये – श्रेयस का अर्थ है कल्याण , जिस कल्याण से बढकर दूसरा
कोई बड़ा या अधिक महत्वका कल्याण न हो उस सर्वश्रेष्ट या सर्वोपरि कल्याणको निःश्रेयस कहते है | सर्वश्रेष्ट कल्याण है – ‘मोक्ष ‘ ,
अर्थात् जन्म-मरणके बन्धनसे मुक्ति | यदि
प्राणी मानव जन्म लेकर भी मोक्ष प्राप्त नहीं कर सका तो उसने जीवन व्यर्थ ही
गँवाया | वह ‘पुनरपि जननं पुनरपि मरणं पुनरपि जननीजठरे शयनम्‘ के चक्कर मे पड़ा रहेगा | भारत कि यही विशेषता है कि यहाँ धर्मको प्रधानता दी गयी है , कारण
कि धर्म का सीधा सम्बन्ध मोक्षसे है | धर्म से अविरुद्ध कम और अर्थका सेवन करता
हुआ मानव यहाँ मोक्ष प्राप्त कर लेता है | इसलिए सर्वतोभावेन सबको धर्मका पालन
करना चाहिये |
धर्मशास्त्रने निति-नियमोंको विशेष महत्व प्रदान किया है | अतः वेद्, उपनिषद्, रामायण , महाभारत , स्मृति
एवं पुराणादिमें निति-कथन विशेषरूप से हुआ है |
प्राचीन शास्त्रों के मतानुसार धर्म एवं निति का अद्वैत (एक्य) है | धर्म और
निति के परिपालन के बिना कोई भी पुरुषार्थ सिद्ध नहीं होता – ऐसा उनका सिद्धांत है
| महर्षि व्यास और महर्षि वाल्मीकि – जैसे महाकवि , श्रीराम और श्रीकृष्ण – जैसे
भगवदीय अवतारी पुरुषपुंगव तथा सीता, सावित्री, अनुसूया – जैसी महान् पतिव्रता नारियाँ एवं जनक , रघु , पृथु , पूरु, बलि जैसे राजर्षि; ध्रुव – प्रह्लाद – जैसे
भगवद्भक्त; कपिल , पतञ्जलि, कणाद, गौतम- जैसे तत्ववेत्ता; बुद्ध, महावीर आदिशंकराचार्य
जैसे भगवदीय धर्मगुरु- इनके उदात्त चरित प्राचीन भारत के निति – आदर्श मने
गए हैं |
चूंकि मनुष्यका अन्तिम प्राप्तव्य (लक्ष) मोक्ष बताया गया है | जन्म-मृत्यु-चक्रसे
विमुक्त होना ही मोक्ष है | यह भी कहते हैं कि कर्म से मनुष्य बद्ध होता है और
परमेश्वरकि कृपासे किंवा परमार्थज्ञानसे मनुष्य मुक्त होता है | ज्ञान तथा कृपा
केवल बौद्धिक ज्ञानसे किंवा तर्क से प्राप्त नहीं होते है | उनके लिये तो मनुष्यको
विवेक , वैराग्य , तप, मनोग्रह, वासनाक्षय इत्यादिकी आवश्यकता होती है | यही
नितिकि नींव है | मनुष्य धर्म-निति का आश्रय ग्रहण करके सुसंस्कृत हुआ है | यह
वेदादि ग्रंथोके अनुशीलनसे प्रतीत होता है –-
अनुव्रतः पितुः पुत्रो मात्रो भवतु संमनाः |
जाया पत्ये मधुमतीं वाचं बदतु शन्तिवाम् ||
मा भ्राता भ्रातरं द्विक्षन्मा स्वसारमुत स्वसा |
सम्यंच सव्रता भूत्वा वाचं वदत भद्रया ||
अर्थात पुत्रको पितृव्रतका और
माताकी आज्ञाका पालन करना चाहिये, पत्रीको पतिसे मृदु एवं मधुरवाणीमें बोलना
चाहिये | भाईको भाईसे तथा बहन को बहन से विद्वेष नहीं करना चाहिये , परस्परप्रेम
रखकर और समान-ब्रत धारण करके भद्र (कल्याणकारी) वाणीसे बोलना चाहिये |
सहकारी संगठन एवं समता इत्यादिका नितिपूर्ण उपदेश वेदद्वारा इस प्रकार दिया
गया है –
‘सं गच्छध्वं सं बद्ध्वं सं वो मनांसि जानताम्’
अर्थात् तुम मिलकर चलो, एक साथ होकर स्तोत्र-गण
करो , तुम्हारे मनोभाव एकरूप हों |
‘समानी व आकूतिः समाना हृदयानि वः ‘
अर्थात तुम्हारा अध्यवसाय (निश्चय) एक हो , तुम्हारा हृदय भी एक हो | कठोपनिषद
यह संदेश देता है –
‘सह नाववतु | सह नौ भुनक्तु | सह वीर्य करवावहै ‘|
अर्थात् परमात्मा हम दोनों का रक्षण करें , हम दोनों का पालन करें , हम दोनों का एक ही
समय सामर्थ्य – सम्पादन करायें |
ऐसे अनेक नीति – वचन वेद्वाङ्ग्म्य में प्रदर्शित हैं |
.नीति – पालन का तात्पर्य यह है कि परिवार, स्वसमाज और स्वराष्ट्र के उस पार
दृष्टिक्षेप करके हम अखिल मानव - जाति तथा प्राणिमात्र से प्रेम का व्यवहार करें,
विश्वबन्धुत्व उदात्तभाव रखें तथा सभी के साथ मैत्री करें |
ऐसा अत्यन्त विशाल और उदार
मनोभाव प्राचीन ऋषियों ने अभिव्यक्त किया है | प्राणिमात्र के प्रति मैं मित्रभाव
से ही देखूँ और मेरे मन में सभी अपवित्र विचार – श्रृंखलाएँ नष्ट हो जाएँ , मेरे
मन में किसी के भी विषय में शत्रुभाव न हो, कोई बड़ा हो अथवा छोटा हो – मेरा
स्नेहभाव उनपर सदा हो, ऐसी प्रशस्त नीति की प्रार्थना वेद में की गई है |
नीतिकारों नें सत्यवचन तथा मृदुभाशन पर अत्यधिक बल दिया है | सत्य जीवन का
वह अकाट्य धर्म है, जिसने मनुष्य को सामाजिक तथा व्यावहारिक जीवनमें प्रतिष्ठा
प्रदान की है | साथ ही परलोक का मार्ग भी प्रशस्त किया है | मुण्डकोपनिषदका उद्धोष् है –‘ सत्यमेव जयति
नानृतम’
विजय सत्य की होती है असत्य कि नहीं |
आचार्य चाणक्य तो यहाँ तक कहते
हैं –
सत्येन धार्यते पृथ्वी सत्येन तपते रविः |
सतवेन वाति वायुश्च सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम ||
अर्थात
पृथ्वी में धारण कराने की क्षमता सत्ये से ही आती है, सत्य के कारण ही सूर्य तपता है , सत्य के बल पर
ही वायु का संचरण होता है तथा सर्वस्व की प्रतिष्ठा सत्य में ही है |
गोस्वामी तुलसीदासजी कहते
हैं ‘ धरमु न दूसर सत्य समाना | आगम निगम पुरान बखाना ||’ अन्यत्र उनकी अभिव्यक्ति है
‘सत्यमूल सब सुकृत सुहाए | बेद पुरान बिदित मनु गाए ||’
कबीरदास की मान्यता है की
सत्य के बराबर कोई तप नहीं | झूठ के बराबर कोई पाप नहीं | ‘साँच बराबर तप नहीं, झूठ बराबर पाप |’ तथा जिसके ह्रदय में सत्य का वास है वहाँ भगवान का निवास है
– ‘जाके हिरदै साँच है , ताके हिरदै आप ‘|
कवियों के नीति – वचनों में
वाणी की मधुरता पर भी पर्याप्त बल दिया गया है | कबीरदासजी का आग्रह है कि ‘ऐसी बानी बोलिये, मन का आप खोय | औरन कौं सीतल करे, आपहु सीतल होय ||’ उनकी दृष्टि में ‘मधुर वचन है औषधि कटुक वचन है तीर’
यह तीर ( कटु वचन ) प्रवेश तो श्रवणद्वार से करता है किन्तु सालता है सम्पूर्ण
शरीर को –
‘श्रवण द्वार ह्वै संचरै सालै सकल सरीर’|
हिंदी के नीतिकारों ने
आत्मिक उन्नति पर भी पर्याप्त बल दिया है | इस क्रम में उन्होंने उन दोषों कि
चर्चा भी कि है जो आत्मिक उन्नति में बाधक है – काम , क्रोध , लोभ , मोह , मद आदि
ऐसे ही दुर्गुड हैं | कबीरदासजी कि उक्ति है – ‘कम क्रोध मद लोभ की, जब लगी घट मैं खान | कहा मुरख कहा पंडिता, दोनों एक समान
||’
कबीरदासजी कहते हैं कि जबतक मन का मैल साफ़ नहीं होगा तबतक नहाना – धोना व्यर्थ
है | मछली सदैव पानी में रहती है फिर भी उसकी दुर्गन्ध नहीं जाती – ‘न्हाये धोये का भया जो मन मैल न जाय | मीन सदा जल में रहे धोये बास न जाय ||’
नीतिके सिद्धान्तों के अनुपालन
से मन की निर्मलता सहज ही प्राप्त हो जाती है | मन निर्मल हो जाय, अन्तःकरण पवित्र हो जाय तो फिर
आत्मकल्याण स्वयं ही सध जाएगा |
आत्मकल्याण का संदेश प्रदान
करने वाले उपनिषदों को तो नीति – सूक्तों का भण्डार ही माना गया है | तैत्तिरीय
उपनिषद में विद्द्या पूर्ण करके स्वगृह जानेवाले स्त्रात को गुरु उपदेश करते हैं –
‘सत्यं वद, धर्मं चर, स्वाध्यायान्मा प्रमदः ’ – अर्थात् सत्य बोलो धर्म का आचरण करो, स्वाध्याय में प्रमाद मत करो | ‘मातृदेवो भव, पितृदेवो भव , आचार्यदेवो भव, अतिथिदेवो भव’ – माता में देवबुद्धि रखनेवाले बनो, पितामें देवबुद्धि
रखनेवाले बनो, आचार्यमें देवबुद्धि रखनेवाले बनो तथा अतिथिमें देवबुद्धि रखनेवाले
बनो | इसी प्रकार अन्य उपदेशों में कहा गया है – ‘सम्पत्तिका गर्व मत करो’ ,
‘अनिन्द्द एवं पुन्यकारक कर्म ही करो’ , ‘सदाचार का अनुपालन करो |’
इन श्रुतिवचनो में नीतितत्व का सार समाहित है |
कठोपनिषद में एक विशिष्ट
नीतिवचन द्वारा बताया गया है कि इन्द्रियसुख का प्रेयमार्ग छोड़कर शाश्वत सुख –
शांतिका नैतिक श्रेयमार्ग मनुष्य को ग्रहण करना चाहिये | यह श्रेयमार्ग ही
भगवत्प्राप्तिका राजपथ है , जिसपर चलने से सर्वविध कल्याण निश्चित है | अतः
प्रत्येक मानव को इसे स्वीकार करना चाहिये |

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