शुक्राचार्य यद्दपि असुरों के गुरु है , किन्तु ये भगवान् के अनन्य भक्त हैं | ये योगविद्द्या के
आचार्य है और इनकी शुक्रनीति बहुत प्रसिद्ध् है | असुरों के साथ रहते हुए भी ये उन्हें सदा धर्मकी,
नीतिकी, सदाचारकी शिक्षा देते रहे | इन्ही के प्रभाव से प्रह्लाद, बलि तथा विरोचन
आदि भगवद्भक्त बने | शुक्रनीति में अनेक सुन्दर बातें आई हैं, उनमें से कुछ यहाँ
दी जा रही हैं –
(१)
व्यक्ति को चाहिये कि वह दूरदर्शी बने
| सोचविचारकर विवेक से कार्य करे, आलसी किंवा प्रमादी न बने –
दीर्घदर्शी सदा च स्यात् .......... | चिरकारी
भवेन्न हि ||
(२)
बिन सोचे – समझे किसीको मित्र न बनाये |
(३)
विश्वस्तका भी अत्यन्त विश्वाश न करे –
‘नात्यन्तं विश्वसेत्
कञ्चित् विश्वस्तमपि सर्वदा ‘|
(४)
अन्नकी निन्दा न करे – ‘अन्न न निन्द्दात् |’
(५)
आयु, धन, गृहके दोष, मन्त्र, मैथुन, औषध, दान, मान तथा अपमान – इन नौ विषयों को अत्यन्त गुप्त
रखना चाहिये, किसीसे कहना चाहिये –
आयुर्वित्तं गृहच्छिद्रम मंत्रमैथुनभेषजं |
दानमानापमानं च नवैतानि सुगोपयेत ||
(६)
किसी के साथ कपटपूर्ण व्यवहार तथा किसी की आजीविका की हानि नहीं करनी चाहिये
एवं कभी भी किसीका मन से भी अहित नहीं सोचना चाहिये |
(७)
दुर्जनों की संगति का परित्याग करना चाहिये –
‘त्यजेदुर्जनसंगतं ‘ |
(८)
सुख का उपभोग अकेले न करे , न सभी पर विश्वास ही करे और न सभी पर शंका ही करे –
नैकः
सुखी न सर्वत्र विश्रोब्धो न च शङ्कितः |
सब प्रकार के राजधर्म और नीतिसंदर्भों को बताकर अंत में
महामति शुक्राचार्य जी भगवान श्री राम को
सर्वोपरि नीतिमान बताते हुए कहते है कि इस पृथ्वी पर भगवान श्री राम के समान कोई
दूसरा नीतिमान राजा नहीं हुआ –
‘न रामसदृशो राजा पृथिव्यां नीतिमानभूत ‘
इस नीतिवचन द्वारा शुक्राचार्य यही संदेश प्रसारित करते हैं
कि राजाओं को श्री रामके समान बनाना चाहिये और प्रजा को श्री राम के आचरणों का अनुकरण
करना चाहिये –
‘रामादिवद वर्तितव्यं ‘| इसी में सबका परम कल्याण है
|
भगवान दत्तात्रेयके वचन
अन्तमें हम भगवान श्री दत्तात्रेय के वचन को यहाँ प्रस्तुत
करते हैं जिसे उन्होंने अपने शिष्य श्रीकार्तिक स्वामी को परम (मोक्ष ) – कि
प्राप्ति के सरल उपाय के रूपमें चार सोपानों में बताया –
रागद्वेषविनिर्मुक्तः
सर्वभूतहिते रतः |
दृढबोधश्च धीरश्च स गच्छेत् परमं पदम् ||
अर्थात् (१) ‘राग’ (आसक्ति – ममत्व ) एवं ‘द्वेष’
(ईर्ष्याभाव ) – से विमुक्त होना, (२) सभी प्राणियों के हित (कल्याण ) में रत
(कार्यरत ) रहना, (३) ब्रह्मज्ञानविषयक बोध दृढ होना तथा (४) धैर्यवान होना – ये
परम – पद – प्राप्ति के चार सोपान हैं | वस्तुतः ये ही सम्पूर्ण नीतियों के सार है
और भगवत्प्राप्ति के सहज साधन हैं |
No comments:
Post a Comment