‘ नीतिरस्मि जिगीषताम् ’ ‘विजयकी इच्छा
रखनेवालों के लिये मैं नितिस्वरूप हूँ’ – श्रीमद्भगवद्गीतामें भगवान श्रीकृष्णकी
यह उक्ति बड़ी मार्मिक और महत्वकी है | भव (संसार) – सागरको पार कर लक्ष्यको
प्राप्त कर लेना जीवनकी विविध जटिलताओं पर विजय प्राप्त करना ही है, और जो लोग यह
विजय प्राप्त करना चाहते है , उनके लिये प्रभु स्वंय नितिस्वरूप हैं – यह भगवान की
वाणी है |
अब प्रश्न यह उठता है कि नितिका
अर्थ क्या है ? मनुष्य जीवनके वास्तविक लक्ष्यको प्राप्त करने के लिये साधनरूप में
जिन बातों कि आवश्यकता है वस्तुतः उसी का नाम निति है |
धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष इन
चार पुरुषार्थों तथा इन्हें प्राप्त करने के उपायों का निर्देश जिसके द्वारा अथवा
जिसमे होता है उसे निति कहते हैं | मानव यदि नितिवचनों के अनुसार व्यवहार करता है
तो अपना अभीष्ट फल प्राप्त करता है और यदि नितिविरुद्ध आचरण करता है तो असफल हो
जाता है – यह बात अनुभव सिद्ध है |
वास्तव में नितिशास्त्रका अर्थ है ‘कर्माकर्मविवेक’ | समाज में ब्यक्ति ,
परिवार ,जाति. वर्ग , राष्ट्र आदि भिन्न-भिन्न घटक होते हैं | उसमें ब्यक्ति ,
समाज . जाति , संस्था आदिको परस्पर कैसा व्यवहार करना चाहिये, कैसे रहना चाहिये इस
सम्बन्धमें कतिपय विशेष नियम होते हैं, जिन्हें ‘नीतिशास्त्र' कहते हैं |
राज्य के सर्वविध अभ्युदयके लिये
राजनीति, धार्मिक अभ्युदयकी प्राप्ति के लिये धर्मनीति और जीवनके विविध
क्षेत्रोंमें सफलता प्राप्त करने के लिये व्यवहारनिति , समृधिके लिये अर्थनीति,
इसी प्रकार प्रबल आततायी तथा धूर्त शत्रुपर विजय पाने के लिये कूटनीति आदिके
उल्लेख शास्त्रोंमें उपलब्ध हैं |
संसारका प्रत्येक प्राणी सुखकी
आकांक्षा रखता है और नीतिका आश्रयण भी वह अपने सुखके लिये ही करता है | कोई भी
अपनी विपत्तिके लिये नितिको नहीं अपनाता | नीतिशास्त्रके महान विद्वान चाणक्यका
पहला वाक्य है – ‘सुखस्य मूलं धर्मः ‘ सुखका मूल आधार धर्म है | इसलिए सर्वोतम
निति धर्माचरण ही है | धर्म केवल इसी शरीरके लिये नहीं है अपितु देहत्यागके बाद भी
धर्म साथ रहता है | बृहदारन्यकोपनिषद्के मैत्रेयी-याज्ञवल्क्य-संवादमें बताया गया है – ‘ सबसे
बढ़कर प्रिय आत्मा है और आत्माके प्रियका साधन धर्म है |’ इस तत्वको जिस प्रकार
सरल-सुगम रूपसे समझानेका उपाय किया जाय , वही निति है | तात्कालिक लाभ को प्राप्त
करना ही निति नहीं है | सही निति वह है जिसमे वर्तमान और भविष्यत्कल में भी अनिष्टकी
कि संभावना न हो | जो ऊपरकी ओर ले जाय , वह निति है | चाणक्य ने कहा है कि
इसके विपरीत जो ले जाय वह निति नहीं दुर्नीति है |
ऋग्वेदमें नितिशब्दका प्रयोग
अभीष्ट फल कि प्राप्तिके लिये हुआ है, उसमे मित्र और वरुणसे प्रार्थना करते हुए
कहा है कि वे हमें ऋजु अर्थात सरल अथवा अकुटिल नितिके अभीष्टकी सिद्धि करायें – ‘
ऋजुनिति नो वरुणो मित्रो नयतु विद्वान् ‘ | ब्रहम्वैवतपुराण – में निति को परिभाषित करते हुए कहा गया है कि जो चर्चा
सत्य , हित और परिणाममें सुख देनेवाली है वही निति है |

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